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माँ

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माँ एक ही शब्द काफी है परिभाषित करने के लिए , पुत्र का प्यार ही है उसे सुशोभित करने के लिए ।    बिन कहे ही समझ जाती वो दिल की हर बात , अपने आँचल मे वो कर लेती सबको आत्मसात । जिसकी वंदना करे सृष्टि के ब्रम्हा विष्णु महेश , वो कैसे कर सकती है घर मे कोई क्लेश । उसके बिना लगे घर आँगन हमेशा सूना , उसके होने से ही खुशियाँ हो जाती दूना । हमेशा रक्षा करती उसकी दुआएँ बन मजबूत ढाल , जब भी कोई बलाएँ हो पड़ती आन । हर मुश्किल का हँस कर लेती सामना , ना कभी रखे वो मन मे कोई दुर्भावना । जिसका संबल ही हो पुत्र का आधार , जिसके संस्कार , चरित्र और हो उच्च विचार । उस देवी को करता हूँ नमन बारंबार , उसके चरणों मे अर्पित धवल पुष्पहार ।   © तरुण आनंद 

प्रकृति का संदेश

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प्रकृति का संदेश पूरी पृथ्वी स्थिर है, क्या अजीब मंजर है, प्रकृति भी पूरे रौ में चुभो रही खंजर है । कैसा यह विनाश का हो रहा तांडव है, रास्ते वीरान, पशु-पक्षी हैरान, जमीन भी अब बंजर है । आज सब कैद हैं अपने ही बनाए मकानों में, कितनी महँगी है ज़िंदगी, यह मिलती नहीं दुकानों में । ये कैसी छाई वीरानी है और कैसी है ये मदहोशी, सबके चेहरे सुर्ख है और पसरी है अजीब सी खामोशी । कल तक सारे लोग जो मौज में थे, पता नहीं ! क्यों आज वही सब खौफ में है । क्या शूल बनके चुभ रही है हवा, या प्रकृति दे रही है हम सभी को सजा । समस्त मानव जाति है तबाह और परेशान, आज सबकी पड़ गयी है संकट में जान । जितनी निर्ममता से किया था दोहन प्रकृति का, उतनी ही जल्दी संदेशा आया विपत्ति का । यही तो वक़्त है संभलने का, कदम मिला कर प्रकृति संग चलने का । शांत बैठो, धैर्य रखो, बिगड़े को सुधरने दो, वक़्त दो, साथ दो, प्रकृति को फिर से सँवरने दो । हरियाली का मान रखो, स्वयं को इंसान बना डालो, स्वच्छता का हाथ थाम, बीमारी को मिटा ...

भाग्य की लिखावट

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भाग्य की लिखावट ज्योति ............ बिलकुल , ज्योति ही नाम था उसका । 16 वर्ष की उम्र , मासूम पर गंभीर , साँवले रंग की नाटे कद काठी की वो साधारण सी दिखने वाली वास्तव मे कर्मठ , जीवट , हिम्मती एवं मेहनती लड़की थी । चार बहनो नेहा , शबनम व नंदनी मे वो दूसरे नंबर पर थी । वक़्त के थपेड़ो ने उसके चेहरे की मासूमियत को उतार फेंका था और समय से पहले ही उसे काफी मजबूत और परिपक्व कर दिया था । चारों बहनों मे ज्योति काफी समझदार थी। जहाँ वो अपने माता पिता के लिए आदर्श थी वही अपनी बहनो के लिए रक्षा कवच थी । वो पढ़ने मे भी काफी तेज थी , पर कम उम्र मे ही उसे दुनियादारी की पूरी समझ हो चुकी थी और उसने अपने बचपन को जीने की चाहत को छोड़ अपनी सारी इच्छाओ को अपने परिवार के खातिर बलि दे दी । ज्योति के माता पिता की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी , उन पर चार बच्चो की परवरिश का बोझ था जिस कारण वो हमेशा चिंतित रहा करते थे । चूंकि चारों लड़कियां ही थी , सो उनके शादी की चिंता भी खाये रहती थी उन्हे । इस चिंता के कारण ज्योति के पापा हमेशा तनावग्रस्त व बीमार रहा करते थे । ज्योति के पापा एक प्राइवेट कंपनी मे का...

चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौटे

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चौबे चले छब्बे बनने , दुबे बन कर लौटे जब से ई मुआ कोरोना आया है तब से चौबाइन बड़ी परेशान है । चौबाइन अपने घर के अंदर से कोरोना को गरियाते हुये बाहर निकली तो कुछ लौंडे लपारिए निहायत ही निठल्ले से उसके घर के सामने मटरगश्ती करते नजर आए । अब चौबाइन का माथा गरम हो गया , तन बदन मे आग भभक उठी । उसने उन लौंडो की जम कर खबर ली , खूब गरियाने लगी , खरी खोटी सुनाने लगी । चौबाइन के इस अप्रत्याशित हमले और कोरोनो के बीच अचानक आए इस आपदा से उन लौंडो की तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी , घिग्घी बंध गयी । वे सब लौंडे चौबाइन के हमले से बच बचाकर गिरते पड़ते उस गली से भाग निकले । अब चौबाइन फिर से कोरोना को गरियाने लगी । ई मुआ कोरोना तो कही बैठने लायक भी नहीं छोड़ा , न घर से निकल सकते है , न किसी के यहाँ जा सकते है , न किसी से गप्पे लड़ा सकते है , न किसी से जी भर के लड़ सकते है और न ही किसी की चुगली कर सकते है । अब चौबाइन के पेट मे आदतन दर्द उठने लगा और जी भर के चीन को गरियाने लगी । सत्यानाश हो जाए इन चीन वालों का जो कीड़ा-पिल्लू , साँप-छुछुंदर , ऑक्टोपस –चमगादड़ सब को जिंदा गटक जाते है । इ...