प्रकृति का संदेश पूरी पृथ्वी स्थिर है, क्या अजीब मंजर है, प्रकृति भी पूरे रौ में चुभो रही खंजर है । कैसा यह विनाश का हो रहा तांडव है, रास्ते वीरान, पशु-पक्षी हैरान, जमीन भी अब बंजर है । आज सब कैद हैं अपने ही बनाए मकानों में, कितनी महँगी है ज़िंदगी, यह मिलती नहीं दुकानों में । ये कैसी छाई वीरानी है और कैसी है ये मदहोशी, सबके चेहरे सुर्ख है और पसरी है अजीब सी खामोशी । कल तक सारे लोग जो मौज में थे, पता नहीं ! क्यों आज वही सब खौफ में है । क्या शूल बनके चुभ रही है हवा, या प्रकृति दे रही है हम सभी को सजा । समस्त मानव जाति है तबाह और परेशान, आज सबकी पड़ गयी है संकट में जान । जितनी निर्ममता से किया था दोहन प्रकृति का, उतनी ही जल्दी संदेशा आया विपत्ति का । यही तो वक़्त है संभलने का, कदम मिला कर प्रकृति संग चलने का । शांत बैठो, धैर्य रखो, बिगड़े को सुधरने दो, वक़्त दो, साथ दो, प्रकृति को फिर से सँवरने दो । हरियाली का मान रखो, स्वयं को इंसान बना डालो, स्वच्छता का हाथ थाम, बीमारी को मिटा ...